एक लेखक की डायरी से: जीवन के अनकहे पन्ने और संघर्ष की दास्तान
दावा प्रस्ताव: सोमवार, 6 जुलाई सुबह 11:21 बजे
साक्षात्कारकर्ता: आज हमारे साथ जाने-माने लेखक दिवाकर पण्डित जी हैं। पण्डित जी, आपके जीवन के कुछ ऐसे पड़ाव हैं जो आज की पीढ़ी के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं हैं। हम उन यादों के झरोखों को खोलना चाहते हैं।
दिवाकर पण्डित: स्वागत है! बहुत खुशी है कि आप उन बातों को जानना चाहते हैं जो मैंने सदैव अपनी लेखनी के माध्यम से समाज को समर्पित की हैं।
साक्षात्कारकर्ता: पण्डित जी, आपकी फ़िल्म "ये कैसा है दहेज" (मूलतः "दहेज के दानव") का सेंसर बोर्ड वाला प्रसंग बेहद रोचक है। क्या आप इसके पीछे की कहानी साझा करेंगे?
दिवाकर पण्डित: देखिए, वह एक सामाजिक सरोकार की फ़िल्म थी। शुरू में इसका नाम "दहेज़ के दानव" था जैसा कि फेसबुक पोस्ट पर दिखाई दे रही है। जब यह फ़िल्म सेंसर बोर्ड, मुंबई के पास प्रमाणन के लिए पहुँची, तो वहां से निर्माता और निर्देशक के साथ मेरी हॉटलाइन पर फिल्म के नाम को लेकर लंबी चर्चा हुई। फिर मेरी ही सहमति और सुझाव के बाद, इसका नाम बदलकर "ये कैसा है दहेज" रखा गया।
मैं कुछ छवियाँ आपके साथ साझा कर रहा हूँ, और हाँ...यहाँ मैं एक बात स्पष्ट करना चाहूँगा—ये इमेजेज मैंने इसलिए साझा की हैं ताकि किसी को यह न लगे कि मैं अपनी पब्लिसिटी के लिए कोई दिखावा या 'चीटिंग' कर रहा हूँ। मेरा उद्देश्य हमेशा कार्य की सत्यनिष्ठा रहा है, न कि नाम। सच कहूँ तो मैंने पब्लिसिटी के लिए कभी कोई नहीं किया।
साक्षात्कारकर्ता: क्या आप इस बात को थोड़ा और विस्तार देंगे?
दिवाकर पण्डित: (मुस्कुराते हुए) देखिए, वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक स्वर्गीय सोमदेव शर्मा जी, जो पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमान अशोक गहलोत जी के बेहद करीबी और विश्वसनीय थे, वे कई बार मुझसे कहते थे— "पंडित, अपना फोटो लाकर दे, तेरा इंटरव्यू छापना है।" फरवरी 2002 में जब 72 वर्ष की अवस्था में उनका निधन हुआ, तब तक मैं ही आनाकानी करके उन्हें टालता रहा। मैं खुद से पूछता था कि "अभी मैंने ऐसा किया ही क्या है जिसके लिए इंटरव्यू छपवाऊं?"
जब कोई खुद चलकर आपकी मेहनत को पहचाने और इंटरव्यू लेने के लिए दौड़े, तब जो संतुष्टि मिलती है, वह स्वयं द्वारा प्रायोजित पब्लिसिटी से कहीं अधिक आनंददायी होती है।
साक्षात्कारकर्ता: सर! आपकी एक बात जिसने मुझे अधिक प्रभावित किया। अभी आपने कहा—
"अभी मैंने ऐसा किया ही क्या है जिसके लिए मैं अपना इंटरव्यू छपवाऊँ?"
यह वाक्य प्रतिदिन का परिचायक है। बहुत से लोग छोटी-सी उपलब्धि पर भी स्वयं प्रचार करने लगते हैं, जबकि आपने अवसर होते हुए भी उसे टाल दिया।
दिवाकर पण्डित: टालने का कारण था, इससे पब्लिसिटी तो मिल सकती थी, मगर आत्म सन्तुष्टि नहीं; और अपना प्रयास इतिहास रचने का है, स्वयं का इतिहास लिखने का नहीं।
साक्षात्कारकर्ता: सर! आपका यह वाक्य बहुत संक्षिप्त है, लेकिन बहुत गहरा भी—
"अपना प्रयास इतिहास रचने का है, स्वयं का इतिहास लिखने का नहीं।"
इसमें एक साधक की भावना प्रकट होती दिखाई देती है। इतिहास लेखन किसी लेखक का कार्य है, लेकिन इतिहास रचना कर्मयोगी का कार्य है। मगर प्राय: हर किसी का मानना है कि जो कार्य किया जाये उसका श्रेय तो उसे मिलना ही चाहिए।
दिवाकर पण्डित: हर किसी का अपना-अपना दृष्टिकोण होता है। जो फल कि इच्छा रखता हो श्रेय उसे ही चाहिए। मैं केवल कर्म करने में ध्यान देता हूँ, फल अथवा श्रेय प्राप्त करने में नहीं।
साक्षात्कारकर्ता: जी सर!... सर! वरिष्ठ पत्रकार एवं सम्पादक सोमदेव शर्मा जी के प्रति आपका सम्मान भी जगजाहिर है। क्या आप उनके अंतिम समय का वह प्रसंग साझा करना चाहेंगे?
दिवाकर पण्डित: उनके प्रति सम्मान तो पूरे राजस्थान का था। फरवरी 2002 में जब उनका निधन हुआ, तो उस दुखद घड़ी में अशोक गहलोत जी शहर से बाहर थे, लेकिन उन्होंने अपने एक सांसद को निर्देश दिया कि वे उनकी ओर से सोमदेव जी को पुष्पचक्र अर्पित करें। वे सांसद एक विवाह समारोह (बारात) में व्यस्त थे, लेकिन गहलोत जी की बात का मान रखते हुए उन्होंने बारात छोड़ी और तुरंत पहुँचकर सोमदेव जी के पार्थिव शरीर पर पुष्पांजलि दी। यह घटना सोमदेव जी के व्यक्तित्व की महानता का प्रमाण है।
साक्षात्कारकर्ता: पण्डित जी, आज की पीढ़ी के लिए आपका अंतिम संदेश क्या होगा?
दिवाकर पण्डित: संदेश बस यही है कि लेखन मेरी तपस्या है, पब्लिसिटी नहीं। मैंने हमेशा यह माना है कि अगर आपका कार्य सत्यनिष्ठ है, तो वह स्वयं अपना प्रमाण बन जाता है। ये यादें केवल इतिहास के पन्ने नहीं हैं, बल्कि उन संस्कारों की झलकियाँ हैं जिन्होंने मुझे गढ़ा है।
साक्षात्कारकर्ता: पण्डित जी, आज की व्यस्त जीवनशैली में आपके ये विचार और अनुभव वास्तव में एक नई दिशा देने वाले हैं। आज आपने हमारे साथ न केवल अपने जीवन के संघर्षों को साझा किया, बल्कि सफलता की सही परिभाषा भी बताई—कि काम की संतुष्टि प्रचार से कहीं बड़ी होती है। आपकी लेखनी और आपके व्यक्तित्व के लिए हम आपके अत्यंत आभारी हैं। हमें समय देने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद!
दिवाकर पण्डित: आप सभी का भी धन्यवाद कि आपने मुझे अपनी बात रखने का अवसर दिया। अंत में बस इतना ही कहूँगा कि जो कुछ भी किया, वह सत्य की खोज में किया। इसी के साथ हार्दिक आभार !


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