एक लेखक की डायरी से... | इतिहास रचने की साधना | लेखक दिवाकर पंडित से एक विशेष संवाद - Jurney-Dreamland

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गुरुवार, 16 जुलाई 2026

एक लेखक की डायरी से... | इतिहास रचने की साधना | लेखक दिवाकर पंडित से एक विशेष संवाद

 

एक लेखक की डायरी से...

जीवन के अनकहे पन्ने

अध्याय – 1

इतिहास रचने की साधना

स्टोरी & स्क्रिप्ट राईटर  दिवाकर पण्डित से  एक विशेष संवाद


भूमिका

किसी भी व्यक्ति के जीवन का मूल्य केवल उसकी उपलब्धियों से नहीं आँका जा सकता। वास्तविक पहचान इस बात से होती है कि उसने अपने समय, अपने समाज और अपने व्यक्तियों को किस दृष्टि से देखा।

कुछ लोग जीवन जीते हैं और समय के साथ भुला दिए जाते हैं। कुछ लोग अपने जीवन का इतिहास स्वयं लिखते हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जो अपने लिए नहीं, समाज के लिए लिखते हैं; जिनके शब्द प्रसिद्धि के लिए नहीं, समाज और दुनिया में उचित परिवर्तन के लिए जन्म लेते हैं।

दिवाकर पण्डित  ऐसे ही रचनाकारों में से एक हैं।


लेखन, नाटक, चलचित्र और सामाजिक सरोकार—इन सबके बीच उनका एक ही उद्देश्य रहा— समाज को कुछ लौटाना। उन्होंने कभी अपनी पहचान बनाने के लिए लेखनी नहीं चलाई; वे हमेशा उन विषयों को चुना, जिनसे समाज का प्रत्यक्ष संबंध था। चाहे बालविवाह जैसी कुरीति हो, दहेज जैसी सामाजिक समस्या हो, या जीवन-मूल्यों से जुड़े प्रश्न—उनकी रचनाओं का केंद्र हमेशा मनुष्य और समाज ही रहा।

उन्होंने लेखन को कभी केवल शब्दों का कौशल नहीं माना। उनके लिए लेखनी एक उत्तरदायित्व थी—समाज की उन वक्ताओं को शब्द देना, जिनके बारे में लोग सोचते तो थे, पर खुलकर बोलने का साहस कम ही कर सिखाते थे।

यही कारण है कि उनकी रचनाओं का केंद्र मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना रही। कभी बालविवाह जैसी कुरीति के खिलाफ टेलीफिल्म "लाली" लिखी, तो कभी दहेज प्रथा पर प्रहार करती फिल्म "ये कैसा है दहेज" की कहानी और पटकथा रची।

उनके जीवन में ऐसे अनेक प्रसंग आए, जिन्हें वे उन प्रतिक्रियाएं को उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत कर सकते थे; लेकिन उन्होंने उन्हें प्रचार का माध्यम नहीं बनाया। शायद यही कारण है कि उनकी स्मृतियों में आत्मप्रशंसा नहीं, आत्मचिंतन अधिक दिखाई देता है।


लेकिन इन उपलब्धियों से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण है उनका जीवन-दर्शन।

उन्होंने कभी अपनी रचनाओं को प्रसिद्धि का माध्यम नहीं बनाया। उनका विश्वास रहा कि यदि कर्म सच्चा है, तो समय स्वयं उसका साक्षी बन जाता है।

तेजस्वी विचार और जीवन-प्रसंगों को जानने के उद्देश्य से प्रस्तुत है लेखक दिवाकर पंडित से हुई एक आत्मीय बातचीत। जिसमें घटनाओं से अधिक विचार हैं, और उपलब्धियों से अधिक जीवन-दर्शन।


संवाद परिचय

साक्षात्कारकर्ता:

पण्डित जी! आज जब लोग आपको लेखक, पटकथा-लेखक और समाज-सरोकार से जुड़े रचनाकार के रूप में जानते हैं, तो सहज ही मन में प्रश्न उठता है—क्या आपकी साहित्यिक और फ़िल्मी यात्रा की शुरुआत "ये कैसा है दहेज " से हुई थी?


दिवाकर पण्डित :

नहीं...

उससे पहले मैंने लगभग आधे घंटे की हिन्दी टेलीफिल्म "लाली" (बालविवाह – एक अभिशाप) की कहानी और पटकथा भी  लिखी थी।

उस समय मेरे मन में केवल एक विचार था—यदि लेखनी समाज की किसी कुरीति को चुनौती नहीं दे सकती, तो उसका उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

"लाली" का विषय बालविवाह था। उस समय भी यह समस्या अनेक परिवारों में किसी न किसी रूप में विद्यमान थी। मैंने सोचा कि यदि साहित्य और फिल्म मिलकर समाज के सामने प्रश्न उठाएं, तो ये समाज में व्याप्त उस कुरीति के विरुद्ध एक विनम्र प्रयास था, जो न जाने कितने बचपनों का भविष्य छीन लेती है, इसीलिए शायद परिवर्तन की दिशा में एक छोटा-सा कदम रखा जा सकता है।

इस टेलीफिल्म में मैंने केवल कहानी और पटकथा ही नहीं लिखी, बल्कि उसमें अभिनय भी किया। लेखक के रूप में पात्रों को गढ़ना एक अनुभव था, और प्राप्त पात्रों को कैमरों के सामने जीवंत करना बिल्कुल अलग अनुभव।

बाद में जब "ये कैसा है दहेज" का निर्माण हुआ, तब उसमें भी मुझे अभिनय करने का अवसर मिला। उस फिल्म में मैंने मुख्य नायिका के पिता  की भूमिका निभाई।

मेरे लिए अभिनय कभी लक्ष्य नहीं रहा; वह केवल अपनी बात को अधिक प्रभावी ढंग से समाज तक पहुँचाने का एक माध्यम था।

लेखन और अभिनय— दोनों ही मेरे जीवन के अभिन्न अंग रहे हैं। आज भी हैं और अंतिम श्वास तक रहेंगे।

हाँ, इतना ज़रूर है कि मैंने इन्हें कभी प्रसिद्धि प्राप्त करने का साधन नहीं माना। मैंने सदा इन्हें अपना कर्तव्य और कर्म समझकर निभाया है।

मेरा विश्वास है कि मनुष्य का अधिकार केवल अपने कर्म पर है। यदि कर्म ईमानदारी और निष्ठा से किया जाए, तो सम्मान, प्रसिद्धि और सफलता अपने समय पर स्वयं उभरती हैं; उनके पीछे चलने कीआवश्यकता नहीं रहती।


साक्षात्कारकर्ता:

इसका मतलब यह हुआ कि आपकी लेखनी की शुरुआत मनोरंजन से नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना से हुई? या फिर आपकी लेखनी और आपका अभिनय— दोनों का उद्देश्य केवल कला का प्रदर्शन नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना रहा? 

दिवाकर पण्डित :

बिल्कुल।

मेरे लिए साहित्य, सिनेमा और अभिनय—ये तीनों अलग-अलग विधाएँ नहीं हैं। ये समाज तक अपनी बात पहुँचाने के तीन अलग-अलग माध्यम हैं।

यदि मेरी किसी कहानी से एक भी परिवार दहेज जैसी कुप्रथा पर पुनर्विचार करे, यदि किसी टेलीफिल्म से किसी लड़कियों का बालविवाह रुक सके, यदि किसी पात्र के माध्यम से समाज में थोड़ी-सी भी सकारात्मक सोच जन्म ले—तो मैं अपनी रचना को सफल मानता हूँ।

मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार हमेशा यही रहा है कि मेरी लेखनी समाज के किसी व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का कारण बन सके।

मेरे लिए लेखनी हो, मंच हो या कैमरा—ये तीनों समाज से संवाद करने के माध्यम हैं।

अगर मेरी किसी कहानी से किसी भी परिवार या मनुष्य की  सोच खत्म हो जाए...

यदि किसी पात्र के माध्यम से किसी व्यक्ति की सोच बदल जाए...

यदि किसी रचना से समाज में किसी कुरीति के विरुद्ध एक छोटा-सा प्रश्न भी खड़ा हो जाए...

तो मैं मानता हूँ कि मेरी रचना सफल हुई।

मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार किसी मंच पर मिलने वाला सम्मान नहीं, बल्कि वह क्षण है जब कोई पाठक या दर्शक यह कहे—

"आपकी रचना ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया।"

साक्षात्कारकर्ता :

आपकी दोनों फिल्मों का विषय भी सामाजिक कुरीतियों पर आधारित रहा—पहले "लाली" और फिर "ये कैसा है दहेज" । क्या यह एक संयोग था या आपने बताए ऐसे विषयों का चयन किया?


दिवाकर पंडित :

यह संयोग नहीं था।

मैंने हमेशा यह अनुभव किया कि साहित्य और सिनेमा केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यदि किसी रचना के माध्यम से समाज के भीतर एक प्रश्न भी जन्म ले, तो वह रचना अपना उद्देश्य प्राप्त कर लेती है।

बालविवाह हो या दहेज— दोनों ही ऐसी सामाजिक कुरीतियाँ हैं जो केवल किसी एक परिवार को नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समाज को प्रभावित करती हैं।

इसी सोच ने पहले "लाली" को जन्म दिया और बाद में "ये कैसा है दहेज" की रचना हुई।


साक्षात्कारकर्ता :

"ये कैसा है दहेज" का मूल नाम "दहेज के दानव" था। यह परिवर्तन कैसे हुआ?


दिवाकर पंडित :

यह अपने आप में एक रोचक अनुभव था।

फिल्म का मूल शीर्षक "दहेज के दानव" रखा गया था। जब फिल्म प्रदर्शन  के लिए सेंसर बोर्ड, मुंबई पहुँची, तब उसके शीर्षक को लेकर चर्चा प्रारम्भ हुई।

निर्माता, निर्देशक और बोर्ड अधिकारीयों के बीच फिल्म के नाम को लेकर काफी देर तक  विचार-विमर्श चलता रहा। फिर हॉटलाइन पर मुझसे  विचार-विमर्श हुआ...

अंततः आपसी सहमति और मेरे सुझाव के आधार पर फिल्म का नाम बदलकर "ये कैसा है दहेज" कर दिया गया।

आज पीछे मुड़कर देख रहा हूँ तो लगता है कि यह परिवर्तन उचित था। नया शीर्षक केवल एक प्रश्न नहीं था, बल्कि समाज के सामने रखा गया एक दर्पण था—जो हर उस व्यक्ति से पूछता है कि आखिर "ये कैसा है दहेज?"


साक्षात्कारकर्ता :

जब कोई लेखक अपनी रचना में परिवर्तन स्वीकार करता है, तो अक्सर उसके लिए वह आसान नहीं होता। आपको उस समय कैसा लगा?


दिवाकर पंडित :

यदि परिवर्तन रचना को लोगों के बीच प्रस्तुत करने के लिए आवश्यक हो, तो उसे स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए।

मेरे लिए नाम से ज़्यादा ज़रूरी उसे लोगों तक पहुँचाना अति आवश्यक है ।

यदि वही संदेश अधिक व्यापक रूप से लोगों तक पहुँच सकता है, तो परिवर्तन स्वीकार करना स्वभाविक  है। लेखक के लिए तो ये गर्व का विषय होना चाहिए।


साक्षात्कारकर्ता :

आज के समय में ज़्यादातर लोग अपनी किसी भी उपलब्धि का व्यापक प्रचार करते हैं। लेकिन आपके बारे में कहा जाता है कि आपने अपने कार्यों का प्रचार स्वयं कभी नहीं किया। क्या यह स्वभाव था या कोई सिद्धांत?


दिवाकर पंडित :

यह मेरा स्वभाव भी था और जीवन का सिद्धांत भी।

मैंने सदैव यह माना कि मनुष्य को अपने कार्य पर ध्यान देना चाहिए, स्वयं के प्रचार पर नहीं।

यदि रचना में सत्य और गुणवत्ता होगी, तो उसका मूल्य समय स्वयं निर्धारित करेगा।

क्षणिक प्रसिद्धि से आत्मसंतोष नहीं मिलता।

आत्मसंतोष तब मिलता है, जब आपका अपना अंतःकरण यह कहे—

"जो किया, पूरी ईमानदारी से किया।"

इसी कारण मैंने कभी अपने कार्यों का अथवा स्वयं का प्रचार करने की आवश्यकता अनुभव नहीं की।


साक्षात्कारकर्ता :

क्या इसी कारण आपने अपने जीवन में कई ऐसे अवसर भी छोड़ दिए, जिनसे आपको व्यक्तिगत प्रसिद्धि मिल सकती थी?


(क्रमशः — अगले भाग में वरिष्ठ पत्रकार एवं सम्पादक स्वर्गीय सोमदेव शर्मा जी से सम्बन्धित अत्यंत प्रेरक प्रसंग...)

साक्षात्कारकर्ता :

क्या यही कारण था कि आपने अपने जीवन में कई ऐसे अवसर भी सहज रूप से छोड़ दिए, जिनसे आपको व्यक्तिगत प्रसिद्धि मिल सकती थी?


दिवाकर पंडित :

जी हाँ।

एक घटना आज भी मेरे मन में बिल्कुल ताज़ा है।

वरिष्ठ पत्रकार एवं सम्पादक स्वर्गीय सोमदेव शर्मा जी से मेरा अत्यंत आत्मीय संबंध था। वे राजस्थान की पत्रकारिता का एक प्रतिष्ठित नाम थे। पूर्व मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत जी भी उनका अत्यंत सम्मान करते थे और उन पर विशेष विश्वास रखते थे।

सोमदेव जी मुझसे कई बार कहा करते थे—

"पंडित! अपना एक फोटो लेकर आ, तेरा इंटरव्यू छापना है।"

यह बात वे एक बार नहीं, अनेक बार कही।

लेकिन मैं हर बार मुस्कुराकर बात टाल देता था।


साक्षात्कारकर्ता :

आज के समय में तो लोग स्वयं अपना परिचय प्रकाशित करवाने के अवसर खोजते हैं। आपने ऐसा अवसर बार-बार क्यों टाल दिया?


दिवाकर पंडित :

क्योंकि उस समय मेरे मन में केवल एक ही प्रश्न उठता था—

"अभी मैंने ऐसा किया ही क्या है, जिसके लिए अपना इंटरव्यू छपवाऊँ?"

मुझे लगता था कि केवल कुछ रचनाएँ लिख लेने से कोई व्यक्ति बड़ा नहीं हो जाता।

यदि समाज स्वयं आपके कार्य को महत्व दे, तब उसकी प्रसन्नता अलग होती है।

लेकिन यदि व्यक्ति स्वयं अपने बारे में कहने लगे कि उसने बहुत बड़ा कार्य किया है, तो उससे प्रसिद्धि तो मिल सकती है, आत्मसंतोष नहीं।

मैं अपने भीतर उस आत्मसंतोष की प्रतीक्षा कर रहा था।

इसलिए मैंने कभी स्वयं आगे बढ़कर अपने लिए प्रचार का प्रयास नहीं किया।


साक्षात्कारकर्ता :

तो क्या आपके लिए प्रसिद्धि का कोई महत्व नहीं था?


दिवाकर पंडित :

मैं प्रसिद्धि का विरोधी नहीं हूँ।

यदि वह आपके कर्म का स्वभाव परिणाम बनते आए, तो उसका सम्मान करना चाहिए।

लेकिन यदि प्रसिद्धि ही उद्देश्य बन जाए, तो कर्म पीछे छूट जाता है।

मैंने हमेशा कर्म को आगे रखा प्रसिद्धि को नहीं।

मेरा विश्वास रहा है कि यदि आप कार्य के  प्रति निष्ठावान है, तो उसे पहचान कराने का कार्य समय स्वयं कर देता है।


साक्षात्कारकर्ता :

फिर फरवरी 2002 में सोमदेव शर्मा जी के निधन का समाचार आया। उस समय की कोई स्मृति आज भी आपके मन में है?


दिवाकर पंडित :

हाँ...

वह दिन आज भी स्मृतियों में वैसा ही जीवित है।

फरवरी 2002 में जब 72 वर्ष की आयु में सोमदेव जी का निधन हुआ, तब पूरा राजस्थान शोकाकुल था।

उस समय श्री अशोक गहलोत जी शहर से बाहर थे। जैसे ही उन्हें यह दुःखद समाचार मिला, उन्होंने अपनी ओर से एक सांसद को निर्देश दिया कि वे जाकर सोमदेव जी को पुष्पचक्र अर्पित करें।

संयोग से उस समय वे सांसद एक बारात में सम्मिलित थे।

लेकिन उन्होंने विवाह समारोह छोड़ दिया और सीधे वहाँ पहुँचे, जहाँ सोमदेव जी की अंतिम यात्रा की तैयारियाँ चल रही थीं। वे मुख्यमंत्री की ओर से श्रद्धासुमन अर्पण किए।

यह दृश्य केवल एक व्यक्ति को श्रद्धांजलि देने का नहीं था।

यह उस सम्मान का प्रमाण था, जो एक निष्पक्ष, निर्भीक और प्रतिष्ठित पत्रकार अपने जीवन के कर्मों से अर्जित करता है।


साक्षात्कारकर्ता :

क्या उस घटना ने आपके जीवन-दर्शन को और अधिक दृढ़ किया?


दिवाकर पंडित :

निश्चित रूप से।

उस दिन मुझे एक बात और गहराई से समझ में आई—

सम्मान कभी माँगा नहीं जाता।

सम्मान अर्जित किया जाता है।

और उसे अर्जित करने का एक ही मार्ग है—

निष्ठापूर्वक अपना कर्म करते रहना।

मनुष्य का वास्तविक परिचय उसके शब्दों से नहीं, बल्कि उसके कर्मों से बनता है।

शायद यही कारण है कि मैंने जीवन भर अपने कार्य को ही अपना परिचय बन दिया।


साक्षात्कारकर्ता :

सर! अभी आपने एक वाक्य कहा—

"सम्मान कभी मांगा नहीं जाता, अर्जित किया जाता है।"

लेकिन आपके जीवन-दर्शन का एक और वाक्य भी लोगों को बहुत प्रभावित करता है—

"अपना प्रयास इतिहास रचने का है, स्वयं का इतिहास लिखने का नहीं।"

क्या इस वाक्य के पीछे भी यही सोच है?


🌺 (यहीं से अगले भाग में इस पूरे अध्याय का सबसे प्रभावशाली और दार्शनिक संवाद सम्मिलित होगा, जहाँ "इतिहास रचने का है..." वाला प्रसंग, कर्मयोग, आत्मसंतोष और जीवन का अंतिम संदेश आएगा।)


साक्षात्कारकर्ता :

सर! अभी आपने एक वाक्य कहा—

"सम्मान कभी मांगा नहीं जाता, अर्जित किया जाता है।"

लेकिन आपके जीवन-दर्शन का एक और वाक्य भी लोगों को अत्यंत प्रभावित करता है—

"अपना प्रयास इतिहास रचने का है, स्वयं का इतिहास लिखने का नहीं।"

इस एक वाक्य में जैसे पूरा दर्शन समाया हुआ है। क्या आप इसके पीछे की भावना हमारे पाठकों के साथ साझा करना चाहेंगे?


दिवाकर पंडित :

(कुछ पल मौन...)

जीवन ने मुझे एक बात बहुत प्रारम्भ में ही सिखा दी थी—

मनुष्य अपने बारे में जो लिखता है, वह इतिहास नहीं होता।

इतिहास वह होता है, जिसे समय लिखता है...

जिसे समाज स्वीकार करता है...

और जिसे आने वाली पीढ़ियाँ स्मरण प्रेम हैं।

इसी कारण मैंने कभी अपने जीवन का इतिहास स्वयं लिखने का प्रयास नहीं किया।

मैंने केवल अपना कर्म किया।

यदि उस कर्म में सच्चाई होगी, तो इतिहास स्वयं उसे अपने पन्नों में स्थान देगा।

और यदि सच्चाई नहीं होगी, तो चाहे मनुष्य अपने बारे में कितनी भी किताबें क्यों न लिख दे, समय उन्हें स्वीकार नहीं करेगा।


साक्षात्कारकर्ता :

लेकिन आज का समय तो बिल्कुल विपरीत दिशा में चलता दिखाई देता है। लोग छोटी-सी उपलब्धि को भी बड़े प्रचार के साथ प्रस्तुत करते हैं।


दिवाकर पंडित :

प्रत्येक व्यक्ति का अपना-अपना दृष्टिकोण है।

मैं किसी का मूल्यांकन नहीं करता।

लेकिन मैंने अपने लिए जो मार्ग चुना, वह थोड़ा अलग था।

मुझे हमेशा लगा कि यदि मैं अपना अधिकांश समय स्वयं को सिद्ध करने में लगा दूंगा, तो मानवता के लिए कार्य करने का समय कम पड़ जाएगा।

इसलिए मैंने अपना समय अपने कार्य को दिया, अपने प्रचार को नहीं।

मेरा विश्वास रहा है कि यदि कार्य में सच्चाई होगी, तो उसका परिचय देने का उत्तरदायित्व स्वयं समय निभाएगा।


साक्षात्कारकर्ता :

क्या यही कारण है कि आपने कभी अपने कार्यों का श्रेय लेने का प्रयास भी नहीं किया?


दिवाकर पंडित :

श्रेय मिल जाए तो उसका सम्मान करना चाहिए।

लेकिन श्रेय प्राप्त करने की इच्छा लेकर कार्य करना...

यह मेरे स्वभाव में कभी नहीं रहा।

मैंने भगवद्गीता का अध्ययन किया है और ये अध्ययन केवल पढ़ने के लिए नहीं किया, उसे जीवन में उतारने का प्रयास भी किया।

धीरे-धीरे यह अनुभव हुआ कि जब मनुष्य अपने कर्म से प्रेम करने लगता है, तब फल की चिंता अपने आप कम होने लगती है।

और जहाँ फल की चिंता कम हो जाती है, वहाँ मन पूर्णत: स्वतंत्र रूप से काम करता है।


साक्षात्कारकर्ता :

क्या यही आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि है?


दिवाकर पंडित :

यदि प्राप्त शब्द का प्रयोग करना ही हो...

तो मैं यही कहूँगा कि मुझे अपने कर्म से प्रेम करना आ गया।

मैंने लेखन किया...

एक्टिंग की...

फ़िल्में लिखीं...

मानवीय विषयों पर कार्य किया...

लेकिन इनमें से किसी को भी मैंने अपनी प्रसिद्धि का साधन नहीं बनाया।

मैंने उन्हें अपना धर्म और अपना कर्म समझकर किया।

मेरे लिए यही सबसे बड़ी उपलब्धि है।


साक्षात्कारकर्ता :

यदि आज का कोई युवा लेखक या कलाकार आपसे यह पूछे कि उसे सफलता कैसे मिले, तो आप उसे क्या उत्तर देंगे?


दिवाकर पंडित :

मैं उसे सफलता का नहीं...

सार्थकता का मार्ग बताऊँगा।

सफलता कभी-कभी भाग्य से भी मिल जाती है।

लेकिन सार्थकता...

वह केवल कर्म, धैर्य, सत्यनिष्ठा और निरंतर साधना से प्राप्त होती है।

इसलिए मैं उससे यही कहता हूँ—

अपने कार्य से प्रेम करो।

अपने ज्ञान को निरंतर बढ़ाओ।

अपनी प्रकृति (चरित्र) को अपने शब्दों से बड़ा बनाओ।

और इतना श्रेष्ठ कार्य करो कि एक दिन तुम्हारे बारे में लोग स्वयं लिखे...

तुम्हें स्वयं अपने बारे में लिखने की आवश्यकता न रहे।


साक्षात्कारकर्ता :

सर! आपकी पूरी जीवन-यात्रा को यदि एक ही वाक्य में व्यक्त करना हो, तो वह वाक्य क्या होगा?


दिवाकर पंडित :

(मुस्कुराते हुए...)

शायद वही...

जिसे आप अभी दोहरा रहे थे—

"अपना प्रयास इतिहास रचने का है, स्वयं का इतिहास लिखने का नहीं।"

और यदि इस वाक्य में एक पंक्ति और जोड़ने की अनुमति दें, तो मैं इतना और कहना चाहूँगा—

"मनुष्य की पहचान उसके द्वारा कही गई बातों से नहीं, बल्कि उसके द्वारा किए गए कर्मों से होती है। इसलिए मैंने सदैव अपने कर्म को ही अपना परिचय बनने दिया है।"


समापन

साक्षात्कारकर्ता :

सर ! आज आपने केवल अपने जीवन के कुछ प्रसंग ही हमारे साथ साझा नहीं किए, बल्कि कर्म, उत्तरदायित्व, कृतज्ञता और आत्मसंतोष का एक ऐसा जीवन-दर्शन भी दिया, जिसकी प्रासंगिकता समय के साथ और अधिक बढ़ेगी।

आपकी यह यात्रा हमें यह विश्वास दिलाती है कि सच्चे अर्थों में इतिहास वही रचते हैं, जो स्वयं इतिहास बनने की आकांक्षा नहीं रखते।

आपका हृदय से धन्यवाद कि आपने अपने जीवन के इन अनमोल अनुभवों को हमारे साथ साझा किया।


दिवाकर पंडित :

मैं भी आपका हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ।

यदि मेरे जीवन के अनुभव किसी एक व्यक्ति को भी सही दिशा में सोचने की प्रेरणा दें, तो मैं समझूंगा कि मेरी लेखनी और मेरा जीवन— दोनों सार्थक हुए।

अन्त में बस इतना ही कहना चाहूँगा —

"कर्म करते रहिए। समय सबसे निष्पक्ष लेखक है। यदि आपके कर्म सच्चे हैं, तो एक दिन वही समय आपके जीवन की सबसे सुंदर कहानी लिख देगा।"




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