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गुरुवार, 16 जुलाई 2026

 

एक लेखक की डायरी से...

जीवन के अनकहे पन्ने

अध्याय – 1

इतिहास रचने की साधना

स्टोरी & स्क्रिप्ट राईटर  दिवाकर पण्डित से  एक विशेष संवाद


भूमिका

किसी भी व्यक्ति के जीवन का मूल्य केवल उसकी उपलब्धियों से नहीं आँका जा सकता। वास्तविक पहचान इस बात से होती है कि उसने अपने समय, अपने समाज और अपने व्यक्तियों को किस दृष्टि से देखा।

कुछ लोग जीवन जीते हैं और समय के साथ भुला दिए जाते हैं। कुछ लोग अपने जीवन का इतिहास स्वयं लिखते हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जो अपने लिए नहीं, समाज के लिए लिखते हैं; जिनके शब्द प्रसिद्धि के लिए नहीं, समाज और दुनिया में उचित परिवर्तन के लिए जन्म लेते हैं।

दिवाकर पण्डित  ऐसे ही रचनाकारों में से एक हैं।


लेखन, नाटक, चलचित्र और सामाजिक सरोकार—इन सबके बीच उनका एक ही उद्देश्य रहा— समाज को कुछ लौटाना। उन्होंने कभी अपनी पहचान बनाने के लिए लेखनी नहीं चलाते; वे हमेशा उन विषयों को चुना, जिनसे समाज का प्रत्यक्ष संबंध था। चाहे बालविवाह जैसी कुरीति हो, दहेज जैसी सामाजिक समस्या हो, या जीवन-मूल्यों से जुड़े प्रश्न—उनकी रचनाओं का केंद्र हमेशा मनुष्य और समाज ही रहा।

उन्होंने लेखन को कभी केवल शब्दों का कौशल नहीं माना। उनके लिए लेखनी एक उत्तरदायित्व थी—समाज की उन वक्ताओं को शब्द देना, जिनके बारे में लोग सोचते तो थे, पर खुलकर बोलने का साहस कम ही कर सिखाते थे।

यही कारण है कि उनकी रचनाओं का केंद्र मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना रही। कभी बालविवाह जैसी कुरीति के खिलाफ टेलीफिल्म "लाली" लिखी, तो कभी दहेज प्रथा पर प्रहार करती फिल्म "ये कैसा है दहेज" की कहानी और पटकथा रची।

उनके जीवन में ऐसे अनेक प्रसंग आए, जिन्हें वे प्रतिक्रियाएं तो उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत कर सकते थे; लेकिन उन्होंने उन्हें प्रचार का माध्यम नहीं बनाया। शायद यही कारण है कि उनकी स्मृतियों में आत्मप्रशंसा नहीं, आत्मचिंतन अधिक दिखाई देता है।


लेकिन इन उपलब्धियों से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण है उनका जीवन-दर्शन।

उन्होंने कभी अपनी रचनाओं को प्रसिद्धि का माध्यम नहीं बनाया। उनका विश्वास रहा कि यदि कर्म सच्चा है, तो समय स्वयं उसका साक्षी बन जाता है।

तेजस्वी विचार और जीवन-प्रसंगों को जानने के उद्देश्य से प्रस्तुत है लेखक दिवाकर पंडित से हुई एक आत्मीय बातचीत। जिसमें घटनाओं से अधिक विचार हैं, और उपलब्धियों से अधिक जीवन-दर्शन।


संवाद परिचय

साक्षात्कारकर्ता:

पण्डित जी! आज जब लोग आपको लेखक, पटकथा-लेखक और समाज-सरोकार से जुड़े रचनाकार के रूप में जानते हैं, तो सहज ही मन में प्रश्न उठता है—क्या आपकी साहित्यिक और फ़िल्मी यात्रा की शुरुआत "ये कैसा है दहेज " से हुई थी?


दिवाकर पण्डित :

नहीं...

उससे पहले मैंने लगभग आधे घंटे की हिन्दी टेलीफिल्म "लाली" (बालविवाह – एक अभिशाप) की कहानी और पटकथा लिखी थी।

उस समय मेरे मन में केवल एक विचार था—यदि लेखनी समाज की किसी कुरीति को चुनौती नहीं दे सकती, तो उसका उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

"लाली" का विषय बालविवाह था। उस समय भी यह समस्या अनेक परिवारों में किसी न किसी रूप में विद्यमान थी। मैंने सोचा कि यदि साहित्य और फिल्म मिलकर समाज के सामने प्रश्न उठाएं, तो ये समाज में व्याप्त उस कुरीति के विरुद्ध एक विनम्र प्रयास था, जो न जाने कितने बचपनों का भविष्य छीन लेती है, इसीलिए शायद परिवर्तन की दिशा में एक छोटा-सा कदम रखा जा सकता है।

इस टेलीफिल्म में मैंने केवल कहानी और पटकथा ही नहीं लिखी, बल्कि अभिनय भी किया। लेखक के रूप में पात्रों को गढ़ना एक अनुभव था, और प्राप्त पात्रों को कैमरों के सामने जीवंत करना बिल्कुल अलग अनुभव।

बाद में जब "ये कैसा है दहेज" का निर्माण हुआ, तब उसमें भी मुझे अभिनय करने का अवसर मिला। उस फिल्म में मैंने मुख्य नायिका के पिता की भूमिका निभाई।

मेरे लिए अभिनय कभी लक्ष्य नहीं रहा; वह केवल अपनी बात को अधिक प्रभावी ढंग से समाज तक पहुँचाने का एक माध्यम था।

लेखन और अभिनय— दोनों ही मेरे जीवन के अभिन्न अंग रहे हैं। आज भी हैं और अंतिम श्वास तक रहेंगे।

हाँ, इतना ज़रूर है कि मैंने इन्हें कभी प्रसिद्धि प्राप्त करने का साधन नहीं माना। मैंने सदा इन्हें अपना कर्तव्य और कर्म समझकर निभाया है।

मेरा विश्वास है कि मनुष्य का अधिकार केवल अपने कर्म पर है। यदि कर्म ईमानदारी और निष्ठा से किया जाए, तो सम्मान, प्रसिद्धि और सफलता अपने समय पर स्वयं उभरती हैं; उनके पीछे चलने की आवश्यकता नहीं रहती।


साक्षात्कारकर्ता:

इसका मतलब यह हुआ कि आपकी लेखनी की शुरुआत मनोरंजन से नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना से हुई? या फिर आपकी लेखनी और आपका अभिनय— दोनों का उद्देश्य केवल कला का प्रदर्शन नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना रहा? 

दिवाकर पण्डित :

बिल्कुल।

मेरे लिए साहित्य, सिनेमा और अभिनय—ये तीनों अलग-अलग विधाएँ नहीं हैं। ये समाज तक अपनी बात पहुँचाने के तीन अलग-अलग माध्यम हैं।

यदि मेरी किसी कहानी से एक भी परिवार दहेज जैसी कुप्रथा पर पुनर्विचार करे, यदि किसी टेलीफिल्म से किसी लड़कियों का बालविवाह रुक सके, यदि किसी पात्र के माध्यम से समाज में थोड़ी-सी भी सकारात्मक सोच जन्म ले—तो मैं अपनी रचना को सफल मानता हूँ।

मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार हमेशा यही रहा है कि मेरी लेखनी समाज के किसी व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का कारण बन सके।

मेरे लिए लेखनी हो, मंच हो या कैमरा—ये तीनों समाज से संवाद करने के माध्यम हैं।

अगर मेरी किसी कहानी से किसी भी परिवार या मनुष्य की  सोच खत्म हो जाए...

यदि किसी पात्र के माध्यम से किसी व्यक्ति की सोच बदल जाए...

यदि किसी रचना से समाज में किसी कुरीति के विरुद्ध एक छोटा-सा प्रश्न भी खड़ा हो जाए...

तो मैं मानता हूँ कि मेरी रचना सफल हुई।

मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार किसी मंच पर मिलने वाला सम्मान नहीं, बल्कि वह क्षण है जब कोई पाठक या दर्शक यह कहे—

"आपकी रचना ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया।"

साक्षात्कारकर्ता :

आपकी दोनों फिल्मों का विषय भी सामाजिक कुरीतियों पर आधारित रहा—पहले "लाली" और फिर "ये कैसा है दहेज" । क्या यह एक संयोग था या आपने बताए ऐसे विषयों का चयन किया?


दिवाकर पंडित :

यह संयोग नहीं था।

मैंने हमेशा यह अनुभव किया कि साहित्य और सिनेमा केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यदि किसी रचना के माध्यम से समाज के भीतर एक प्रश्न भी जन्म ले, तो वह रचना अपना उद्देश्य प्राप्त कर लेती है।

बालविवाह हो या दहेज— दोनों ही ऐसी सामाजिक कुरीतियाँ हैं जो केवल किसी एक परिवार को नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समाज को प्रभावित करती हैं।

इसी सोच ने पहले "लाली" को जन्म दिया और बाद में "ये कैसा है दहेज" की रचना हुई।


साक्षात्कारकर्ता :

"ये कैसा है दहेज" का मूल नाम "दहेज के दानव" था। यह परिवर्तन कैसे हुआ?


दिवाकर पंडित :

यह अपने आप में एक रोचक अनुभव था।

फिल्म का मूल शीर्षक "दहेज के दानव" रखा गया था। जब फिल्म प्रदर्शन  के लिए सेंसर बोर्ड, मुंबई पहुँची, तब उसके शीर्षक को लेकर चर्चा प्रारम्भ हुई।

निर्माता, निर्देशक और बोर्ड अधिकारीयों के बीच फिल्म के नाम को लेकर काफी देर तक  विचार-विमर्श चलता रहा। फिर हॉटलाइन पर मुझसे  विचार-विमर्श हुआ...

अंततः आपसी सहमति और मेरे सुझाव के आधार पर फिल्म का नाम बदलकर "ये कैसा है दहेज" कर दिया गया।

आज पीछे मुड़कर देख रहा हूँ तो लगता है कि यह परिवर्तन उचित था। नया शीर्षक केवल एक प्रश्न नहीं था, बल्कि समाज के सामने रखा गया एक दर्पण था—जो हर उस व्यक्ति से पूछा है कि आखिर "ये कैसा है दहेज?"


साक्षात्कारकर्ता :

जब कोई लेखक अपनी रचना में परिवर्तन स्वीकार करता है, तो अक्सर उसके लिए वह आसान नहीं होता। आपको उस समय कैसा लगा?


दिवाकर पंडित :

यदि परिवर्तन रचना को अधिक प्रभावी बना रहा हो, तो उसे स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए।

मेरे लिए नाम से ज़्यादा ज़रूरी उसका मकसद था।

यदि वही संदेश अधिक व्यापक रूप से लोगों तक पहुँच सकता था, तो परिवर्तन स्वीकार करना स्वभाव था।

लेखक का अहंकार उसकी रचना से बड़ा नहीं होना चाहिए।


साक्षात्कारकर्ता :

आज के समय में ज़्यादातर लोग अपनी किसी भी उपलब्धि का व्यापक प्रचार करते हैं। लेकिन आपके बारे में कहा जाता है कि आपने अपने कार्यों का प्रचार स्वयं कभी नहीं किया। क्या यह स्वभाव था या कोई सिद्धांत?


दिवाकर पंडित :

यह मेरा स्वभाव भी था और जीवन का सिद्धांत भी।

मैंने सदैव यह माना कि मनुष्य को अपने कार्य पर ध्यान देना चाहिए, उसके प्रचार पर नहीं।

यदि रचना में सत्य और गुणवत्ता होगी, तो उसका मूल्य समय स्वयं निर्धारित करेगा।

क्षणिक प्रसिद्धि से आत्मसंतोष नहीं मिलता।

आत्मसंतोष तब मिलता है, जब आपका अपना अंतःकरण यह कहे—

"जो किया, पूरी ईमानदारी से किया।"

इसी कारण मैंने कभी अपने कार्यों का प्रचार करने की आवश्यकता अनुभव नहीं की।


साक्षात्कारकर्ता :

क्या इसी कारण आपने अपने जीवन में कई ऐसे अवसर भी छोड़ दिए, जिनसे आपको व्यक्तिगत प्रसिद्धि मिल सकती थी?


(क्रमशः — अगले भाग में वरिष्ठ पत्रकार एवं सम्पादक स्वर्गीय सोमदेव शर्मा जी से सम्बन्धित अत्यंत प्रेरक प्रसंग...)


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